ब्रिटिश भारत के सबसे परिचित सिक्कों में रानी विक्टोरिया के सिक्के आते हैं। ये सिक्के इतने बड़े पैमाने पर चले कि आज भी कई घरों के पुराने संदूक़ों में मिल जाते हैं।
इनकी एक ख़ास बात एक शब्द का बदलना है, जो इतिहास की एक बड़ी घटना की ओर इशारा करता है।
“क्वीन” और “एम्प्रेस” का अंतर
विक्टोरिया के आरंभिक सिक्कों पर उन्हें “क्वीन” (रानी) कहा गया। बाद में, जब उन्हें भारत की साम्राज्ञी घोषित किया गया, तो सिक्कों पर उपाधि बदलकर “एम्प्रेस” (साम्राज्ञी) हो गई।
इसलिए एक ही शासक के सिक्कों को इस उपाधि के आधार पर दो कालों में बाँटा जा सकता है — यह संग्राहकों के लिए एक उपयोगी पहचान है।
चित्र और बनावट
इन सिक्कों पर विक्टोरिया का चित्र होता है, और मूल्यवर्ग तथा वर्ष भी अंकित होते हैं। चाँदी के बड़े रुपये से लेकर छोटे ताँबे के सिक्कों तक, कई मूल्यवर्ग जारी हुए।
दशा के अनुसार इनका आकर्षण बहुत बदलता है — घिसे हुए आम सिक्के और साफ़, सुरक्षित सिक्के में बड़ा अंतर होता है।
आम बनाम दुर्लभ
चूँकि ये सिक्के बहुत बड़ी संख्या में बने, अधिकांश आम हैं और उनकी क़ीमत साधारण होती है — “विक्टोरिया का सिक्का है तो लाखों का होगा” जैसी बातें प्रायः ग़लत होती हैं। दुर्लभता कुछ विशेष वर्षों, टकसालों और बेहतरीन दशा से आती है।
सच्ची क़ीमत जानने के लिए भरोसेमंद जानकारी लें; यह लेख केवल सामान्य मार्गदर्शन है।