भारत में एक समान मुद्रा से पहले, ईस्ट इंडिया कंपनी अलग-अलग “प्रेसिडेंसियों” — बंगाल, बंबई और मद्रास — के लिए अलग सिक्के ढालती थी। मद्रास प्रेसिडेंसी के सिक्के इनमें सबसे विविध और दिलचस्प माने जाते हैं।
इन पर आपको अंग्रेज़ी, फ़ारसी, तमिल और तेलुगु — कई लिपियाँ एक साथ मिल सकती हैं, जो उस दौर की बहुभाषी दक्षिण भारतीय दुनिया को दर्शाती हैं।
पगोडा, फ़ैनम और आना
शुरुआती मद्रास सिक्कों में “पगोडा” (सोना), “फ़ैनम” और छोटे ताँबे के सिक्के शामिल थे — नाम और प्रणाली जो बाद की रुपया-आना-पाई व्यवस्था से अलग थी। बाद में कंपनी ने इसे रुपया-आधारित प्रणाली में मिला दिया।
यही बदलती प्रणालियाँ संग्राहक के लिए मद्रास के सिक्कों को इतिहास की परतें खोलने वाला विषय बनाती हैं — हर सिक्का किसी न किसी दौर और नीति की गवाही देता है।
संग्रह और सावधानी
मद्रास प्रेसिडेंसी के ताँबे के सिक्के आमतौर पर सुलभ और शुरुआती संग्राहक के बजट में आने वाले हैं, जबकि सोने के पगोडा दुर्लभ और महँगे हैं। लिपियों और चिह्नों को पहचानना सीखना इस विषय का असली मज़ा है।
हमेशा की तरह — विक्रेता परखें, हालत देखें, और नक़ल से बचें। किसी सिक्के की क़ीमत उसकी दुर्लभता, धातु और सुरक्षा-स्थिति से तय होती है, न कि सिर्फ़ उसकी उम्र से।