आज हम दशमलव प्रणाली के आदी हैं — एक रुपये में सौ पैसे। पर 1957 से पहले भारत की मुद्रा-प्रणाली अलग थी, और पुराने सिक्कों को समझने के लिए उसे जानना ज़रूरी है। इसे एक बार साफ़-साफ़ समझ लेने पर पुरानी संदूक के सारे सिक्के अचानक अर्थ पाने लगते हैं।
पुरानी प्रणाली में: एक रुपया = 16 आना, एक आना = 4 पैसा (या 12 पाई), और एक रुपया = 64 पैसा = 192 पाई। यही वजह है कि आपको “क्वार्टर आना”, “हाफ़ आना”, “टू आना” जैसे नाम मिलते हैं।
सिक्कों को प्रणाली में रखिए
अब पुराने सिक्के जोड़िए: पाई (सबसे छोटा ताँबा), पैसा, आधा पैसा, क्वार्टर आना, आधा आना, दो आना, चार आना, आठ आना और एक रुपया। छोटे मूल्य ताँबे के, बड़े मूल्य (चार आना और ऊपर) अक्सर चाँदी के होते थे।
यह ढाँचा समझते ही आप किसी भी पुराने सिक्के को उसकी जगह पर रख सकते हैं — और यही किसी भी संग्राहक की पहली सीढ़ी है।
1957 का बदलाव
1957 में भारत ने दशमलव प्रणाली अपनाई — एक रुपया अब सौ (नए) पैसे का हुआ। कुछ साल तक सिक्कों पर “नया पैसा” लिखा रहा ताकि लोग भ्रमित न हों। यही वजह है कि 1957 के आसपास के सिक्के दो दुनियाओं के बीच के पुल जैसे हैं।
संग्राहक के लिए यह बदलाव एक बढ़िया विषय है: पुरानी आना-प्रणाली के आख़िरी सिक्के और नई दशमलव प्रणाली के पहले सिक्के — दोनों को साथ रखना इतिहास का एक साफ़ मोड़ दिखाता है।