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स्वतंत्र भारत के सिक्कों के इतिहास में 1957 एक महत्वपूर्ण वर्ष है। इसी वर्ष भारत ने अपनी पुरानी, जटिल आना-पाई व्यवस्था को छोड़कर दशमलव प्रणाली अपनाई, जिसमें एक रुपया सौ पैसे के बराबर हुआ।

यह बदलाव आज हमें सामान्य लगता है, पर उस समय यह एक बड़ा सुधार था।

पुरानी व्यवस्था क्यों बदली

आना-पाई की व्यवस्था में हिसाब लगाना कठिन था, क्योंकि इकाइयाँ दशमलव में नहीं बँटती थीं। दशमलव प्रणाली अपनाने से गणना सरल हो गई और आधुनिक अर्थव्यवस्था के लिए यह अधिक उपयुक्त थी।

दुनिया के कई देश पहले ही दशमलव की ओर बढ़ रहे थे, और भारत का यह क़दम उसी दिशा में था।

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“नया पैसा” नाम की कहानी

नई व्यवस्था के शुरुआती वर्षों में सिक्कों पर “नया पैसा” लिखा गया, ताकि लोग पुराने और नए पैसे के बीच अंतर समझ सकें। कुछ वर्षों बाद, जब व्यवस्था परिचित हो गई, तो “नया” शब्द हटा दिया गया और केवल “पैसा” रह गया।

यही कारण है कि उन शुरुआती वर्षों के “नया पैसा” सिक्के संग्राहकों के लिए एक अलग पहचान रखते हैं।

संग्राहक के लिए महत्व

इस संक्रमण काल के सिक्के भारतीय मुद्रा के एक ऐतिहासिक मोड़ की गवाही देते हैं, इसलिए कई संग्राहक इन्हें विशेष महत्व देते हैं। इनकी क़ीमत, हमेशा की तरह, दशा और दुर्लभता पर निर्भर करती है।

यह लेख सामान्य जानकारी है; किसी सिक्के की असल क़ीमत विशेषज्ञ और बाज़ार ही तय करते हैं।