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1957 भारतीय मुद्रा-इतिहास का एक निर्णायक साल है। इसी साल सदियों पुरानी आना-प्रणाली विदा हुई और दशमलव प्रणाली आई — एक रुपया अब सौ पैसे का। शुरुआती सिक्कों पर “नया पैसा” लिखा गया, ताकि जनता समझ सके कि यह पुराने पैसे से अलग है।

यह छोटा-सा शब्द “नया” उन सिक्कों को इतिहास का मील का पत्थर बना देता है — दो युगों के बीच का पुल।

“नया” कब हटा

“नया पैसा” शब्द कुछ ही सालों तक चला। जब जनता दशमलव प्रणाली की आदी हो गई, तो 1964 के आसपास से सिक्कों पर से “नया” हटा दिया गया और बस “पैसा” रह गया। इसलिए “नया पैसा” वाले सिक्के एक ख़ास, सीमित दौर के गवाह हैं।

संग्राहक इसी वजह से इन सिक्कों को पसंद करते हैं — ये एक छोटे, पहचाने जा सकने वाले कालखंड के हैं, और इनका एक साफ़ ऐतिहासिक अर्थ है।

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संग्रह में इसका स्थान

नया पैसा सिक्के आमतौर पर सस्ते और आसानी से मिलने वाले हैं, जो इन्हें नए संग्राहक के लिए आदर्श बनाता है। एक अच्छा शुरुआती लक्ष्य: 1957 से 1963 तक के सभी “नया पैसा” मूल्य (एक, दो, तीन, पाँच, दस नये पैसे) अच्छी हालत में जुटाना।

ऐसा संग्रह न सिर्फ़ पूरा करने में मज़ेदार है, बल्कि भारत के आधुनिक मुद्रा-इतिहास के एक अहम मोड़ को भी सहेजता है — बिना ज़्यादा ख़र्च के।