दिल्ली सल्तनत के दौर में उत्तर भारत की मुद्रा-व्यवस्था ने नया रूप लिया। इल्तुतमिश ने तेरहवीं सदी में चाँदी का “टंका” और ताँबे का “जीतल” मानक किया — एक ऐसी प्रणाली जो सदियों चली और जिसने बाद के “रुपये” की ज़मीन तैयार की।
टंका सिर्फ़ धातु का टुकड़ा नहीं था; यह सत्ता का ऐलान था। हर सुल्तान अपने नाम, उपाधि और टकसाल के साथ सिक्के ढालता, और वही सिक्के बाज़ार से लेकर मस्जिद तक उसकी हुकूमत की पहचान बनते।
सुलेख ही सजावट है
सल्तनत के सिक्कों की सबसे बड़ी ख़ूबी उनका सुलेख है। चित्र के बजाय, इन पर अरबी-फ़ारसी सुलेख में शासक का नाम, कलमा, टकसाल और हिजरी सन उकेरा जाता। कुछ सुल्तानों — ख़ास तौर पर मुहम्मद बिन तुग़लक़ — के सिक्के अपनी सुंदर लिखावट और साहसी प्रयोगों के लिए मशहूर हैं।
संग्राहक के लिए यही लिखावट पढ़ना असली आनंद है। टकसाल का नाम और सन पढ़ पाना सिक्के की पूरी जीवनी खोल देता है — कब, कहाँ, किसके राज में यह ढला।
तुग़लक़ का मशहूर प्रयोग
मुहम्मद बिन तुग़लक़ का नाम सिक्कों के इतिहास में एक साहसी और असफल प्रयोग के लिए याद किया जाता है: उसने ताँबे-पीतल के “टोकन” सिक्के चलाए जिनका मूल्य चाँदी के बराबर घोषित किया गया। नक़ल इतनी हुई कि व्यवस्था ढह गई और सिक्के वापस लेने पड़े।
यह कहानी संग्राहक को एक सबक भी देती है — भरोसा ही मुद्रा की असली धातु है। और यही प्रयोग इन सिक्कों को इतिहास-प्रेमियों के लिए बेहद दिलचस्प बनाता है।