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मुग़ल बादशाह अकबर (1556–1605) के सिक्के भारतीय मुद्रा-कला के शिखरों में गिने जाते हैं। उसके शासन में सोने की “मोहर”, चाँदी का “रुपया” और ताँबे का “दाम” एक सुव्यवस्थित प्रणाली बन गए, जिनकी शुद्धता और सुंदरता की मिसाल दी जाती थी।

पर अकबर के सिक्के सिर्फ़ अर्थव्यवस्था के औज़ार नहीं थे — वे उसके विचारों का दर्पण भी थे। एक बादशाह जो अलग-अलग धर्मों को जोड़ना चाहता था, उसकी यह सोच उसकी मुद्रा पर भी झलकती है।

इलाही सिक्के और नया संदेश

अपने शासन के बाद के दौर में अकबर ने कुछ सिक्कों पर परंपरागत धार्मिक सूत्र की जगह “अल्लाहु अकबर, जल्ला जलालुहु” जैसे शब्द और अपने बनाए “इलाही” संवत का प्रयोग किया। इतिहासकार इसे उसकी समन्वयवादी सोच — दीन-ए-इलाही — से जोड़ते हैं।

संग्राहक के लिए ये सिक्के इतिहास का जीवंत टुकड़ा हैं। इनकी लिखावट, संवत और शब्द-चयन पढ़ना उस दौर की राजनीति और सोच में झाँकना है।

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पहचान और संग्रह

अकबर के चाँदी के रुपये गोल और चौकोर दोनों रूपों में मिलते हैं, जिन पर टकसाल और सन साफ़ पढ़े जा सकते हैं। टकसालों के नाम — आगरा, लाहौर, अहमदाबाद और कई और — सिक्के की कहानी को और गहरा बनाते हैं।

मुग़ल चाँदी अपेक्षाकृत सुलभ है और नए संग्राहक के लिए अच्छी शुरुआत हो सकती है — बशर्ते वह भरोसेमंद स्रोत से ख़रीदे और नक़ल से सावधान रहे। असली की ठोस छपाई और सही तौल पहचान के पहले सूत्र हैं।